प्रकाशक : सरस्वती पुस्तक भंडार ११२, हाथीखाना, रतनपोल अहमदानाद-३८०००१ फोन ५३५६६९२

प्रथम संस्करण १९३९

पुनरमदरण ९९९६ मूल्य-३००

मुद्रकः - हिमोशु ले्नर सिस्टम ४६, सस्कृत नगर, रोहिणी सेक्टर १४ दिल्ली-११००८५ दूरभाष-७२६२०००, ७८६२१८३

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समपंणम्‌- १-विभाति सदुत्तवु्गणेदापसादवर्णीं युररखदीयः। अरसाद्सो यख निरस्य विं करोमि नित सकरेप्िताथम्‌ ॥!

२-मञ्छलमैनहितैपीत्याख्ये पत्र ्रचारयय्‌ प्रथितः पूणगवेषणममितः सश्चितजैनेतिदासश्च ।! नाथुरामभमी सम्ततघुत्याहयम्नतिमेम्णा ल्याय्षुदसम्पादनलप्नं चेतो ममाका्षीत्‌

२-श्रीजैनवाशीप्रणयी खुसदीकालः स्वधर्मस्य निपेवकोऽस्ति ! यस्यादुकम्पामिरहं चिराय स्याद्रादधि्यालयमाश्रयायि

तेनोदाहृतनान्नां सतां त्रयाणां करारविन्देषु असलाकरदश्ासत्रयै क्रमादर््यते मोदात्‌

न्यायाचायं महेनदरकुमारेण

अन्थानुक्रम

प्रास्ताविक (मुनि जिनविजयजी) १-६

प्राक्रथने (१० सूललारुजी) ७-१३ सम्पादकीय व्कव्य १-१०५ (सम्पादनमाथा, सस्करण परिचय, सबोषन-

सामग्री भ्रामारभदर्लन }

प्रस्तावना (१० महेनकूमार ) ११-१०६

(१) अन्थकार ११.३२

लन्मभूमि-पितृकल ११-१३

स्मय विचारं १२३-१७

भकलंक के श्रन्थ की पुतन १५-३२

भतृहरि-कूमारिल १७-१८

भरहरि-वर्मकीति १८

कूमारिक-वमकीतति १८

धर्मकीति का समय २९१-२४

भर्तृहरि-भरकलक २४

कूमारिकु-भरकलक २४

धर्म॑कीत्ि-भ्रकलंक दषु

वा -अकृल्क २६-२९

कर्णेकगोमि-अकल्कं २९-३०

धर्मोत्तिर~-भरककक २९.३०

चान्तरक्षित-अकलक ३१-३२

(२) अन्य ६३-१०६

शरष्यस्वरूप परिचय २३३-४२

( अल्धत्रय की भ्रकठककतृकता, नाम का इतिहास तथा परिचय, स्वना ीरी )

शछ्यान्तरिक विषय परिचय ४३-१०६

प्र॑माणनिरूपण ४९-७५्‌ प्रमाणसामान्य ४३ प्रमाणसम्प्व 111 ज्ञान का स्वपरसवेदननिचारण्५्‌-४७ प्रत्यक्ष ४८-५२्‌ , सरवज्ञत्वविचार ५२-५७ परोक पू-द्षु वाद ६५-दद्‌ जलय-पराजय व्यवस्या ६६.६७ जाति ६७ श्त ६७.७० वेदापौरषेयत्वविचार ७०७२ प्रमाणामाम ७२

ज्ञानके कारणो का विचार ७२.७४

भरमाणका फल ७५ प्रमेधनिरख्पणं ७५८ प्रमाण का विपथ ७५-७९ ध्रीन्य रौर सन्तान ७६-७८ विभूमवाद स्वेदनाद्रैतादिनिरास ७८-८२ भूतचेतन्थवावंनि शस - र्णं भयनिरूपण ८५.१०४ जेनदष्टिं का आधार भौर्‌ स्थान ८५-९१ नथ ९९.९४ नैगमादिनेय धिवेषन ९४.१०० निक्षेपनिसूपण १००-१०६१ संप्तभगीनिख्यण १०१-१०६ सेप्तभ॑गी १०१-१०१३ सकंादेषा-विकरूदेश १५३-१०४ सशयादिदूषण १०५-१०६ ग्रन्थत्रय का विषयानुक्रम १०७-११६ £ लधीयस्रय सूणयन्थ ) १-२९ न्यायत्रिनिक्चय + २९-६४ ~ ग्रमारसैग्रह 9 &€७-१२७ £ टिष्यण १३१-१८२ कघीयस्तरय टिप्पणे "१३११५१४ ल्यायविनिष्वय टिप्पण १५५.१७० प्रमाणसग्रह टिप्पण १७१-१८० रिप्पणपरिशिष्ट १८१-१८२ १० परिशिष्ट १-६० कधीमस्त्रय-कारिकानुक्रम १-द्‌ र्षीयस्त्रय-भ्रवतरण न्यायविनिद्चय-कारिकानुक्रभ २-१२ प्रमाणसग्रहु-कारिकनृक्रंम १३-१४ प्रभाणसग्रह-भवतरण

रषीयस्वयादिग्रन्थवयगत दीर्दीनिकें

काक्षणिक नामसूची १५-५३

टिप्यणोपयुक्त प्रन्थस्केतविवरण ५३.५७ दिप्पणनिदिष्ट श्राचाय॑सूची ५७ छवीयस्त्रपादिपरन्यत्रयबद्यि भ्रकलकोक्त गद्पद्यसची ५८-५० ११ शदधि-पाठभेद ६०

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श्रीमद्धहाकलङ्कदेवविरवितम्‌

अकलंकम्रन्थत्रयम्‌ [ स्बोपज्ञविच्रतिसदहितं कघीयसख्रयम्‌, न्यायविनिथयः, प्रमाणसंग्रह ] [ न्यायाचा्थं पं० महेन्रकुमारशाजिनिरमितविप्यणादिसदितम्‌ ]

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सम्पादफे न्यायाचार्य परिडित महेन्दरकुमारशाखरी जेन-प्राचीनन्यायतीर्थ

सम्पादक-“न्यायङघयुदचन्द्र न्यायाध्यापक श्री स्याद्वाद जैन महाविद्यालय, भदैनी, वनारतर

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प्रकासन कतौ संचालक-सिधी जेन ग्रन्थमाला अहमवावाद-कलकत्ता

विक्रमाब्द्‌ १६६६ || प्रथमारत्ति, ७५० प्रति [ १६६३९ कि्ठन्द्‌

ग्रन्यमाखा-खुख्यसम्पादक छिखित- =

परास्ताविक

सिंघी जैन ग्रन्थमाला के १२३ मशिके रूपम पाठको के ककमल, चाज यह भकाख्कमन्थत्रय नामक्‌ पुस्तक उपस्थित की जा रदी दै इस भन्थनय के कती श्री ्कटकदेव जेनधरमे के दिगम्बर सप्रदाय के एक महान्‌ ज्योतिर्‌ श्ना चार्य ये जैनमतसतम्मत खास खास सिद्धान्तो जौर पदार्थो की प्माणपरिष्छत व्याख्या ओर तकीभिमत प्रतिष्ठा कएने इन श्राचायं का शायद सर्वाधिक कर्त दै आहैतमत के दानिक व्रिचारो की मौखिक सुश्चखला के व्यवस्थित सकलन फा कारय मुख्यतया इन तीन मचाये ने किया है-१ दिवाकर सिद्धसेन, स्वामी समन्तभद्र ओर्‌ भट अकल्कदेव ] इनमें प्रपर के दो भाचाथं आविष्कारक कोटिके ओर भट अकठुक समुच्ायक ओर प्रसारक कोटिके सिद्रसेन ओर समन्तमद्र, इन दोनों मे कौन पूर्वकालीन टै ओर कौन प्श्चात्कालीन इसका भमी तकं ठीक ठीक निर्णय नहीं हो पाया 1 ज्ञाननयन पडित घुखलालजी ने सम्मतितर्क शादि की प्रस्तावना मे, तथा जैन-इतिदासान्वेपक पण श्री जगलकषिोरजी शुख्तार ने स्वामी समन्तमदे ' नामके पुस्तक मे, इस विषय की यथपि खूत् उदापोदपू्णै माखोचना ओर विवेचना की है, तथापि श्रमी इसमे ओर भी अधिक प्रमाणा जर अधिक अन्वेषणा की ्ावरथकता शपेठित है इसमे सन्टेह नदीं साम्प्रदायिक मान्यतातुसार्‌ दिवाकर सिद्धसेन श्वेताम्बर सम्प्रदाय के प्रभावकं पुरुष हँ जौर स्वामी समन्तमद्र दिगम्बर सम्प्रदाय के तथापि इन दोनो श्नाचार्यो को दोनो सम्प्रदायो के अनुगामी विद्वानो ने, सभान श्रद्धास्छद्‌ ओर समान प्रामारिक के रूपमे स्वीकृत ओर उछिखित किया है | जिस भाद्र साय सिद्धसेनसूरि की कृति्ो श्वेताम्बर साह्य मे प्रतिष्ठित है उसी भाद्र के साय वे दिगम्बर साह्य मे भी उदुषृत है ओर जो सम्मान दिगम्बर साहित्य मे समन्तमद्राचायै फो समर्भित दै वदी सम्मान र्ताम्बर साहि भी सस्त है इन दोनो की कृतियो मे, परर सप्रदाय-मेद की कोई विश्लेषात्मक न्याख्या सूचित दोक, समन्वयात्मक न्याल्या दी विशेषतः विेचित होने से, इन दोनो का स्थान, दोन संप्रदायो मेँ समान सम्मान की कोटि का पात्र बना इरा ३। मष्ट ्नकङ्कदेव, खामी समन्तमद्र के उपह सिद्वान्तो के उपस्थापक, समर्थक, विबेचक जर प्रसारक है ! जिन मूलमूत ताल्लिक विचारो का ओर तर्कै-सवादो का खामी समन्तमद्र ने उदूबोधन या चानिरमाव किया उन्हीका भट अकल्कदेव ने अनेक तह से उपदृक्ष्ण, विरेषण, संचयन, समुपस्यापन, सकन ओर प्रसार्य श्रादि किया

र्‌ शअकलद्भभरन्थत्रय

इस तरद भद्‌ श्रकरुंकदेव ने जैसे समन्तमदोपर्न ्ा्देतमतपकर्षक पदाथ का परि- स्फोट ओर ककत किया वैसे ही पुरातन-सिद्धन्त-प्रतिपादितत जैन पदार्थो का भी, नई मरमाण-परिमाषा ओर तपति से, शअर्ोदूषाटन ओर्‌ वरिचारोदूबोधन क्षिया जो कार्य ेताम्बर्‌ सप्रदाय मँ जिनमद्रगणी, मल्नवादी, गन्वहस्ती ओर हरिमग्रसूरि ने किया वही काय दिगम्बर संप्रदाय मे अनेक अशो मे श्रकेते भट अकठकदेव ने किया; ओर्‌ ष्ट भी कीं अधिकं सदर ओर उत्तमरूपसे किया श्रत एव इस दृष्टि से भटर श्चकठंकदेव जैन-बाद्मयाकाश के यथार्थ ही एक बहुत वद तेजसी नक्षत्र थे! यथपि संद्कुचित विचार के दृष्टिकोण से देखने पर वे संप्रदाय से दिगम्बर दिखाई देते है ओर उस संप्रदाय के जीव्रन के वै प्रबल वलवर्धैक ओर प्राणपोषक्र आचारय प्रतीत होते दै; तथापि उदार दृष्टि से उनके जीवनकार्यं का सिदावलोकन करने पर, वे समग्र यातदर्शन के प्रखर प्रतिष्ठापक ओर प्रचण्ड प्रचारक विदित होते है ! श्रतएव समुचय जेनसध के लिये वे परम पूजनीय ओर परम श्रद्रेय मानने योग्य युगप्रधान पुरुष सिधी जैन अन्थमाला मे, इस प्रकार इनकी तियो का यह संगुम्फन, माला के गौरख के सौरम की सषि का वतनेधाला जौ क्ञानपु-ोतुप व्िद्दू-भमरण को पनी तरफ श्रधिक श्राकृ्ट कएनेवाला होगा अन्थमाला के प्रतिष्ठाता श्रीमान्‌ सिंषीजी, यथपि सप्रदाय की श्टिसे श्वेताम्बर समाज के एक प्रधान थग्रणी जौर जातिनेता पुरुष है; तथापि अपने उच संस्कार ओर उदार समाव के कारण ये साप्रदायिक ज्ुद्रता से स्था परे जेन समाजके व्यापक गौख का, ये साप्रदायिकता के रंगीन ओोर बररूपदशीं चशमे प्न कर उन्नाव ्वरोकन नदीं करते समुदय जैन साहित्यगत घुन्द्र घन्दर अन्थरनो का, मेदमाव-निपपेक्, घुसंखत रीति ते समुद्रार कस्य शौर तदूदरारा जगत्‌ समु्य जेन साहित्य का समाद्र बाना, यदी इस अन्धमराल्ा के स्थापन मेँ इनका ददी ध्येय है ईसी ष्येय के अनुसार, श्नेतावर साद्य की तेपत्तिरूप सममे जानेवाले धूर्व प्रकाशित अन्यान्य अन्धरतनो साथ, भाज दिगम्बर सि के मशिरूप इन कृतियो का मी सर्वप्रथम प्रकाशन किया जा रहा है ओर मविन्य अन्य भी देसे कई दिगम्बराचार्यकृत प्रन्थरल यथासमय प्रकाशित किये जाने की भावना है सिधीजी फा यहं शादय काथ, जन समाज के भन्यान्य धनिक जनोके चयि भअनुकरणीय है जर्दौँ तक हमारा खयाल है, जेन समाज भं, भमी तक सिंघी जीके जैसा शादश उदारचेता, सादिवयप्रिय जौर ज्ञानोपासकं कोई धनिक सजन प्रसर नदी इए, जो इस प्रकार श्चपने द्रव्य का, रमेदमाव से सदुपयोग करने की इच्छा रखते हौ यथपि, श्रीमद्‌ राजचन््रजी की प्रेरणा शद भावना को लद्यकर, उनके अलुयायी जनों मे यद सप्रदायिक भव शिथिल इश्या नजर भाता है ओौर उनके द्वारा संचाङिति रायचनद्र अन्थमाला मे, जो बहत वर्षो से वर्म्बईं से प्रकारित्त दो री दै-

भरास्ताविक

श्वेताम्बर जओौर दिगम्बर दोनो संप्रदायो के कुद ्रन्थो का समान रूपसे प्रकाशन किया जाता है, तथापि उस ग्रन्थमाला का ष्ये शुद्ध सादिखिक होकर उसका ध्येय धार्मिक है। उसके प्ठेजो प्रेरणा है षद एकं श्रसाप्रदायिक शोकर भी, दुसरे अश मे बहुत दु साप्रदायिकं है वेह श्रीमद्‌ राजचन्द्रजी के एकं नये चतएव एक तीसरे ही संप्रदाय का प्रमाव, प्रकाश ओर प्रचार कने कीदृष्टिसे प्रकट की जाती है| सिचौ सेन अन्थमाला पीछे एषा कोई सकुचित हेतु नदीं है इसका हेत्‌ व्छदध सादिव्य-सेवा ओर ज्ञानज्योति का प्रसार करना है जैन धर्म के पूर्वकालीन समर्थं विद्वान्‌ अपने समाज ओरं देश भ, जञानज्योति का प्रकाश पैलाने के िये, यथाशक्ति प्ननेकानेकं विपयो के जो छोटे बडे अनेकानेक ग्रन्थनिवन्धन रूप दीपको का निर्माण कर गये है, लेकिन देश काल की भिन्न प्रिशिति के कारण, वे वैसे क्रियाकारी ` नष्टो कर निर्वाणोन्मुखसे बन रदे दहै, उन्हीं ज्ञानदीपको को, इस नवयुगीन-मद्र्दित नई प्गोधनपद्धति से युपरिमार्जित, सुपरिष्कत ओर सजित कर, समाज ओर देश करे रेगण मे प्रस्थापित करना दी इस प्रथमाला फा एक मात्र ध्येय है समाज ओर देश इससे तत्तद्‌ विष्यो मे उषीपत ओर उज्ज्वल ज्ञान प्रकाश प्रात करे ( (

प्रस्तुत अन्धके संपादक श्रौर सपादन कायै के विषय मं पडितवर श्रीसुखलाल जी ने भपने वक्तव्य मँ यथेष्ट निर्देश कर दिया दै एकं तरह से पेडितजी पराम्न सेदी इस प्न्य का संपादन कार्यं इभा है सपादक पडित श्री महेद्धकुमार जी ्यपने विषय के भावाथ है न्नीर तदुपरान्त खूत् परिश्रमशील बरौर अध्ययनरत भष्यापक है आघु- मिक न्वेषणात्मक श्रौर तुलनत्मकं दृष्टि से विषयो ओर पदाय का परिशीलनं करने यथेष्ट प्रवीण दारौनिक, साप्रदायिक श्रौर वैयक्तिक पूवैभर्टो का पक्षपात रख कर तत्लविचार कटने -की शैली के अनुगामी है इससे मविष्य मे हम इनसे जैन सादिल्र के गमी आखोचन-भत्याखोचन की च्छ आशा है

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अन्थ के उपोद्धातरूम जो निस्तृत निबन्ध राषट्माषा मे लिखा गया है, उसके अवलोकन से, जिज्ञा्ुओ को अन्यगत ्ादं का अथ्डौ तरह भाकंलन हो सकेगा, ओर साध मे बहत से अन्यान्य ताल्तिकं विचारो के मनन ओर चिन्तन की सामग्री भी इस- उपलम्ध दोगी भरन्यकार मद अकठ्कदेव के समय के वारे भे विदानो मे मतमेद चला रा है ईस निषय में पडितजी ने जो छुं नये विचार शौर तरव उपस्थित विये है उन पर तज्ज विद्वान्‌ ययेष्ट उहापोह करे हस इस विषय मे श्यमी अपना कु निणौयक मत देने मे समर्थं है प्रताना के पृ १४-१५ पर पदितजी ने नन्दौचूर्णि के कर्वृल के निषय-मे जो शाका प्रदित की है-बह हमे संरोधनीय

ध्र छकलद्कुमन्थश्रय

मालुम देती है शायद, सवसे पले हमने अपने हरिमद्रसूरि का समयनिरयौय नामक उस पुराने निवन्ध अह सूचित किया था किं नन्दचूर्णिं के कती जिनदास- गणी महत्तर है ओर बे ही निशोधचूर्णि भौर आावरथकनचू्ि के वर्तौ है। ओर नन्दीचूर्िं के प्रान्तोल्लेख से यष मी निर्धारित किया था कि-उसी रचना शक-संवत्‌ ५९८ ( बि ८० ७२३२, मे समस्त हई थी प॑डितजी को चूर्णिका रचनाकाल तो मान्य सराकगता है हेक्रिन करती के त्रिप मे चन्दे है। इसके कर्त जिनदासगणी ही इस्तका यो प्रमाण इन्दे नदी दिखाई देता साथ मे, माडाएका प्रा्यविया संशोषन मन्दिरके जैन कैटलोग से प्रो० 11. 7 कापडि फा मत भी प्रदर्भित किगा है, जिसमे उन्दने नन्दौचूर्णि के कतौ निनदा हैं यह प्रषोपमत्र ईै' रेता का हे प्रो कापडिया ने यह प्रधोपमत्रि है, रेता कथन किस श्रापारसे कियाद इका कोई ज्ञान नदी है। लेकिन उतत केटर्लेगमे जो नन्दीचूर्णि का प्रान्त प्रच खय रोर महाशय ने उद्रृत क्रिया है उकषमे तो, इत बूं के कर्ता 'निनदास गणि महत्तरः टै, रेस प्रकट विधान किया इश्रा मिलता है यह ठीक है कि नन्दीचूणि का यह प्रय गूढ हे ओर गृ रूपमे वूर्णिकार ने श्चपना नाम निर्देश किया है, भिस्ते प्रोर कापद्िया इस गृ भाव को समने मे भक्षफल हृ हो इसका विरेप विस्तार कके हम सिर्फ ययो पर इतना 8 सूचित कट ठेना चाहते है कि-इस पय का जो प्रथम पाद शनिरेणगामे् मदासहानिताः रेषा चिखा इना है वद कुक भषटसा है, इसके बदले (णिरेएणामत्त महासदाजिना' रेसा प्राठ चादिर इस पद में कुल १२ श्र है जौर इन बारह श्यत्तरो को छौटपलट कर्‌ क्रम में रखने से (जिनदाषगणिणा महत्तरेण यहे श्य निकल शाता है! निशौथनूर्णिमे मी ृ्होने इसी ठग से अपना भौर भपने गुरु भादि का नामोषेख किया इसमे नन्दीचूर्णिं के मी कती वही जिनदास गणी महत्तर है जो निशीथवचूणि के कत है यद निशित हे |

# प्रसगवय, हम यहां पर दस नन्दीचूणि के रचना समय के विपय मे भी कुछ निदेश कर देना चाहते है जि तरहे पडित शी महेनधकुमारजी ने, इसके कृत्व के निपय मे एका की है ती तरह विद्वान्‌ इसके रचनाकाल के विपय मेँ भी व॑से ही शका करते है! जितस तरह भ्रो० काप दिया जसे उक्त प्के मर्मको सम कर इसके कर्ता कं नाम को श्रंषोषमात्र' कहु देने का साठस करते दिखाई देते हं, वैसे कु विद्वान्‌, इस चूणि के प्रान्त मेँ जो रचनाकाल निदेशक पवित हे, उत्करे -उतने भवा को प्रक्षिप्त वतल्ला फर, उसका अपाप करते दिलाई देते हँ ! उनका साहस तौ नसे भी बहुत बढ कर वै दस पकितिगत, उस वाक्याश का भपप करके ही नही भूप रहते, वे त्रौ श्रषने छषाये हुए पन्थे से उतने वाक्या को, स्वेच्छापूरवेक निकाल कर बादर फक देने तकका श्रधिकार रखते हे भ्रौर बिना भिसी परमाण बतरलाए देना चाहते कि किसी किसी प्रति मे यह पाठ नही मी भिता है श्रौर सचति यहं प्रक्षिप्त है 1 इत्यादि

नन्दीबूणि की जो भरति छया यई है उसमे रेता ही किया गया नजर भ्रारहाहै। इसके

भस्तानिकं _

इस सम्बन्ध के लो अन्य विचार टै उन पर्‌ हमने भमी तक कोई विशेष विचार नदं किया निदधन मै जिस सिद्धिषिनिश्चय नामक मन्थ निदेश हे हं कलक ही हे या किसी अन्यकृत है इसका विशेष विचार भावरयक दै सम््रदीय मेद के कारण एकी नामके दो दो मन्थ स्वे जाने के उदाहरणो का हमारे सदिस मे शरमाव नही है सिद्धपाइढ, समयसार्‌, नयचकर, धपरीषा शादि देसे अनेक समनामक अन्य

------~ ~~

छयवानेवाे वे ही मुप्रसिद्ध भागमोडारकं भ्राचार्यवर्े भीसागरानन्द सूरि है, जिनकी ्ञानोपासना के हम त्यन्त प्रशसक रीर जिनका धासत्रव्यासग जैनसमाज के समग्र साधुवर्ग मे सर्वोक्कष्टं है 1 सूर्मी महाराज, हरिभद्रुरि के उस समयनिर्णय फे चिश्ड है जो हमने श्रपते निवन्पर मे निषत्त किया है उसौके सवन्ष मे रापका ह्‌ मन्तव्य कि नन्दीचुणि के रचनासमय का जौ निर्देश उसकी श्रान्त पितम किथा गया हई वह्‌ ठीकं मही है भ्रीर इसल्यि बह प्रक्षिप्त है क्रिस ग्न्य मे किती पमिति के परकषप्त होने कौ वात कोई प्राद्वर्यजनक नही होती 1 सेकडो ग्रो मे सकटो पतितिर्य परक्िप्त मिलती लेकिन यह पवित्र प्रक्षिप्त हं या मौलिक इसका विनार प्रौर्‌ निर्णय करिसी अभाग कै श्राषारसे ष्टी किया जाता विना श्राधार के किया जानेवाला कथन विद्रानो को ग्राह्य नही हो सकता भरगर हरमे किसी ग्न्थमे की कोई पक्ति, उसकी पुरानी हस्तलिदिते परौथियो मे, भित्रभिन्न शन्दोवाली या वाक्यागोवारी प्राप्त हो, तो हमे जरूर मानना पड़ेगा कि उस पक्ति की भौलिकंता के विषय भे कु कुर गड भरवर्य ! एते शदित स्थो मे सत्यान्ेपी विदानो का कर्तन्य होता है कि उन पक्तियो का खूब सत्यतपूर्वक सोधन भौर सपादन किमा जाय प्रौर करा की प्रतिमे कोन एाठ मिलता गौर कौन नही भिलता इसके प्रामाणिकं परितम दिया जाय हो सक तौ उसकी फोटो-प्रतिङति भी अरकंट कौ जाय एसा करनेसे हमारा कथनं श्रीर मन्तव्य सत्य का प्रषिकं समर्थने कदनेवाला हौता है श्रीर हमारी प्रामाणिकता वहती नन्दीचूणि के कर्ता बि जिस समये हृए सिद्ध हो, ह्मे उसके वारे मे यत्किचित्‌ मी कदाग्रह नही हँ, वैसे ही हरिमद्रमूरि के समय का जो निर्वारण हमने किया है उससे प्रन्यथा हौ मदि बहु किसी भरन्य प्रामाणिक श्राषारो परसे सिद्ध “हो सकता हो तो हम उसको उसी क्षण स्वीकार करने को उदयते हौ नही , वत्कि उत्सुक भी दै 1 हमारे किये इसमें कीई भ्राग्रह या पूर्वग्रह कौ बातत नहीं है इमाय याग्रह है प्रामाणिकता का यदि, सागरानन्दभूरिजी महाराज, नन्दीचूर्णिं की एेसी कोर पुरानी दृस्तरिशितं रति का वि्वसनीय परस्विय दे श्रौर पता वतार्वे, मि जिसमे उनको, विवादग्रस्त प्ति करे एाठातर मिरु हो या उका सर्वथा भ्रभाव ही दृष्टिगोचर हृभा हो, तो हेम भ्रवदय उनके भ्नृप्रहीत होगे भ्रौर हम अपना रम दूर कर नि श्रित बेग} भ्रन्यथा हमारा गह सन्देह कि * सूरिजी महाराज ने, साभिप्राय, नन्दीचूरभिं के उस उल्लेखं फो नष्ट कर देने का प्रयत्न किया है प्रर वैसकरके भ्रपने एक महान्‌ र्वाचायं की कृति का प्रौर उसके साथ ही एक सार्बजनिक एतिहासिक तथ्यका गपलापे करम का निन्य भ्रपराष किया है“ दुर नही होमा 1 क्योकि हमने जितनी प्रतिय दस ग्रन्थ की जहाँ कटी मढयो भे देवी है उन वर्मे, यह पक्ति वरावर छली हुईं भिली छासर, जवसे सागरानदभुरिजौ की वह मुद्रित प्रति हमारे हाय मे आई तवसे हम इस धिपयमें वडी सावधानी श्रौर ठडी उत्सुकता के चाय धसका भन्वेयण कर रटे हं किं कोई एक भी रति वैसी भिर जाय निमे सूरिजी का मृद्ित किया हा परारुभेद हो, जिससे हम अपनी शका की निवृत्तिं कर सके शौर प्रपने श्न का निवारण केर मिष्यात्व

नष्ट कर सके भ्रगर इस वक्तव्य मे हमारी कृ वुष्टता मासूम दे तो सायमे च्सेक्षमाकौ जनेकीप्रार्थनादै।

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अरकलद्ुमन्धत्रेय

जो दिगम्बर ओर श्वेताम्बर दोनो संप्रदायो मे मिततते हँ ओर भिनके कतौ मिन भिम है इसी तरह बौद्ध ओर ब्राह्मण मत के साहित्य भे भी रसे समनामकं कई प्रन्थ मिलते है 1 केवल मन्ध दी नही, कई समनामक्‌ विद्वान्‌ मी हमरे मूतकाल के इतिष्ास म, मिनन भिश्च सम्प्रदायो मेँ ओर भिन्न मिनन काल मेँ कषे चुके दै, विनका समयादि निधिततया ज्ञात हो सकने के कारण मारे इतिदास्त की गुत्थियों वड़ो जटिल द्य री है गर किसी शास्- कार के विषय मे कोई समयसुचक निर्दश मिल जाता है तो बह भी ठीक है या नदीं इसकी पूरी मीमासा की श्रपेक्ता रखता है समय सूचक सवत्सर भी, यदि उसके साय किसी खाप विरि्ट नामका उन्लेष् नही किया इरा ह्ये तो, विचारणीय श्येता है कि कौन सवत्‌ है-शक है, विक्रम ह, गुप्त ३, हर्षदै या वैता कोई ओर हे हमारे देश के पुराने लेखो मे रसे कर संवतो का रिधान किया इमा मिलता है जिनका चमी कुट प्रता नहीं चला है जिन संवर्तो का प्राम हम एक तरद से निशिता साथ अमुक काल में इभा मानते है, उनके वारे मृ भी कितनी ही रेसी नई नई समस्याए उपस्थित होती रहती है, जो मानी इई निथितता को शकाशील्न वना देती ¡ इसरिये हमारे इन इतिहास की पेयो का ठीक ठीक वास्तविक उत्तः देह निंकालना बडा कलिनि कार्य है इममे कोई शक नही कर इसके किये अहत अन्वेषण, वहत सशोधन, बहुत परिसीलन, शौर बहुत श्राढोचन-प्त्ाढोचन की ्ावरहमकृता दै किसी प्रकार के मिनि से रदित होकर,

केवल सत्य के शद्ध स्वरूप को जानने की इष्ठ से प्रसिति होकर, जो विद्वा्‌, इस मागे प्रषृत्त होति दैवे ही ्रपना चमी लद प्राप्त करने समर्थ होते दै, दूसरे तो भम

की मूलुटेषा मे भाजीवन भठकंते रहते है ओर अन्त तक श्रगति के माग ते प्राद्ुख बने रहते उनको श्चागे वढने का कोई रास्ता मिता दै ओर वे श्रागे बढ सकते

है इतिय ओर तचज्ञान विपयकृ इन जटिल समस्याओ का, निरमिनिवेशता के साय

्आटोचन-अ्त्याटोचन करना ओौर तदद्वारा सम्यगूत्ान का, यथाशक्ति प्रकाश ओर प्रसार

कृटना, यही एक प्रधान नीति, संधी जेन भरन्थमाला द्वारा प्रकाशित करिये जानेवलि

अन्यो के सपादनकार्य मे रखी गई है शौर उसी नीति के आदशौनुसार ये भन्न

योग्य संपादक विद्वानो दवारा संपादित ओर परिष्कृत होकर भरसिद्ध ष्टोरहे दै

अन्यमाला के सचालन मे, इस प्रकार पने इन शट्‌ मित्रो का जो इमे सदयोय परापत

रहय है उसके च्ि हम इनके पूणे कृत

श्रावणशुक्छा र] सवर्‌ १९५६ जिनविजय बव

प्राक्थन

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§ १, पाङ्नयुग ओर संस्छृतयुग का अन्तर-

जैन परम्परा मे प्ाङृतयुग बह है जिसमे एकमात्र प्राकृत माषाजओ मे ही साहित्य रचने की प्रवृत्ति धी सकृतयुग बह हे जिसमे सकृत भाषा मे मी सादिखनिमीण की प्रवृत्त वं प्रतिष्ठा स्थिर हई प्राक्तयुग के साहित्य को देखने से यष्ट तो स्पष्ट जान पडता है कि उस समय मी जैन विद्वान्‌ सस्कृत भापासे, तथा सृत दारीनिक साहित्य से परिचित वरय थे | किए मी सच्कृतयुग मे स्त भाषा मे दी शास रचने की ओर छुक्र होने के कारण यह अनिवार्य था कि सस्कृत माषा, तथा दार्दीनिक साहित्य का भनुसीलन पिक गहरा तथा अधिक व्यापकं हो वाचकं उमास्राति पटले की संच्छत-जेन-रचना का हमे स्ट परमाण नदी मिलता फिर भी सभव है उनके पटले भी वैसी कोई रचना जेन-सादित्य मे इई हो 1 कुचं भी हो सस्छृत-जैन-सादिस्य नीचे लिखी क्रमिकं भूमिकाओ विकपित तथा पुष्ट इआ जान पडता है

१-तत्लक्ञान तथा आचार के पदार्थो का सिर्फ भागमिक टी मे संस्कृत-भाषा मे रूपान्तर, जैसे किं तललार्थमाष्य, प्रशमरति चादि

२-उसी हठी के सस्त रूपान्तर मेँ कुच दाईदीनिक छाया का प्रवेश, तैसे स्वार्थतिद्धि 1

३-इने गिन ागमिक पदाथ (खासकर ज्ञानसचन्धी) को लेकर उसपर मुख्यतया तार्बिकटृष्टि से भने्ान्तवाद की दी स्यापना, चैसे समन्तमद्र ओर सिद्धसेन की कृति

४-ज्ञान ओर तत्सवन्धी अागमिक पदाथा का ददईनान्तरीय प्रमाण शाज्ञ की तरह तरकेवद्ध शाक्लीकरण, तथा दशनान्तरीय चिन्तनो का जैन बादूमय ्चधिकाधिक सगती- करणा, जैसे अकरं ओर हरिमद्र ्ादि की कृतियो

५-पू्वीचा्यो की तथा निजी कृतियो के ऊप्‌ व्ि्तृत-विस्वृतर ठीक लिखना जर्‌ उनम दादौनिक वादो का भविकाधिक समवेश करना, जसे बिानन्द, अनन्तर, प्रमाचन््र, अमयदेव, वादिदेव्र यादि की किये

अकलद्मन्थत्रय

६-ताम्बरीय-दिगम्बरीय दोनो प्राचीन कतियो की व्याख्या मे तथा निवी मोलिक छृतियो में नन्यन्याय की परिष्कृत शठी का संचार, तथा उसी शेठी की अपरि- मित कल्मनाओो के द्वारा पुराने हौ जैन-तचचजञान तथा वार सम्बन्धी पदायो का अभूत- पूष विशदीकरण, जैसे उपा्याय यशोविजयजी की कृतयो

उपर्युक्त प्रकार से नन-साहित्य का विकास परििद्धन इया है, फिर मी उस परवल तयग मे कुद जेन पदाथ देते ही रहे है जसे पे प्राकृत तथा ्रागमिक युग मे रे उनपर तकेओटी या दरीनान्तरीय चिन्तन का कोई भमाब ्ाजतक नही पड़ा हे उदा- हरणाथ-समपूणे कर्मशाज्ञ, युणस्यानविचार, पद्द्रन्यषिचारणा, खासकर ठोक तथा जीवकि- भाग आदि | सारांश यह है कि सच्छरत मापा की विशेष उपासना, तथा दारीनिकं प्रन्यो के विशेष परिीलन कै द्वारा जन आचार्यो ने जेन तच्तचिन्तन मँ जो ओौर्‌ जितना विकास किया है, वह सव मुख्यतया न्नान ओर तन्सम्बन्धी नय, अनेकान्त श्रादि पदार्थो के विषयमे ही करिया है! दृसरे प्रमेयो मे जो कुदं नयी चर्चा इई भी है बह बहुत ही थोडी है ओर प्रासगिक मात्र है! न्याय-वैरोपिक, साल्य-भीमासकः, वौद्ध श्रादि दर्शनों के प्रमाणशासखो का अवगाहन जसे जैसे जैनपरम्यरा मे वता गया वैते वैसे जन आाचारयो की निजी प्रमाणशाल्ञ रचनेकी चिन्ता भी तीतर होती चली ओर इसी चिन्ता मे से पुरातन पंचविध ज्ञाननिमाग की भूमिका के उपर नये प्रमाणशाज्ञ का महल खडा इसा

$ २, सिद्धसेन भौर समन्तभद्र-

जैन परम्परा मे तर्कयुग की या न्याय-ममाण-व्रिचारणा की नीव डालने बाले येद ढो चाचार्यं } इनमे से कौन पले या कौन पीके है इलयादि मी घुनिश्चित नहीं है। फिर भी इसमे तो सन्देह ही नही है किं उक्त दोनो आचार्यं ईसा की रपोचिवीं शताब्दी के अनन्तर ही इए है नये साधनो के आधार पर सिद्धसेन दिवाकर का समय टी शताब्दी का शन्त भी समव्रित है जो कुद हो पर स्वामी समन्तमद के वारे मे अनेकविध उद्ापोह के वाद्‌ मु्को श्रव॒ अतिस्पष्ट हो गया है करित शूस्य- पाद देवनन्दी के पृष तो इए री नदी शूज्यपाद के द्वारा स्तु श्राप के समथन मेँ ही उन्होने आा्ठमीमासा लिखी हैः यह वात त्रिधानन्द्‌ ने आ्प्तप्रीकता तथा ््टसषटक्ती में सर्वथा सष्टरू से छिखी है सामी समन्तमद्र की सन कृतियो की मापा, उनमें मरति- पादित दर्भनान्तरीय मत, उनकी युक्ति्यो, उनके निरूपण का ठंग ओौर उनमें विमान विचारविक्रास, यद सव वस्तु पूज्यपाद के पहले तो जैन परपरा मे श्ाई दै याने का समव ही था। जो दिगूलाग, मर्चहरि, इमारिल ओर धर्मकीर्ति के अन्यो के साय समन्तमद् की कृतियो की वाद्यान्तर तलना करेगा ओर्‌ जैन संस्कृत सादित के विकास क्रम की ओर्‌ ध्यान देगा धह भेरा उपर्युक्त विचार बड़ी सरलता से समर सेमा

आक्षथन

अधिक संमव तो यष्ट है कि समन्तमद्र अर अकञ्क के वीच साच्तात्‌ विद्या का सवन्ध दो; क्योकि समन्तमद्र की कृति के ऊपर सर्वप्रयम अकठ्क की ही व्याख्या है 1 यह हो नहीं सकता कि अनेकान्तदष्टि को असाधारण रूपसे स्ट कटनेवाली समन्तमद्र की विविष कृतियो मे श्तिविस्तार से ओर कर्षक रूप से मरतिपादित सप्तमंगियो को तत्लाथ ची व्याख्या मेँ अकटंक तो सर्वथा अपनवि, जव कि पूज्यपाद अपनी ग्याल्या मेँ उसे छु तकं नहीं यद भी समव हे कि-शान्तरदषित के तत्वसमह-गत पानल्वामी शब्द्‌ सवामी समन्तमद का ही सूचक हो कुकर भी हो पर इतना निशित है कि शेता- म्बर्‌ परंपरा भें सिद्धसेन के वाद तुरन्त जिनमद्रगणि क्षमाश्रमण॒ इए ओर दिगम्बर पपरा स्वामी समन्तमद के बाद तुरन्त दी भकठ्क आए 1

§ ३. जिनभद्र ओर अकटक-

यद्यपि शचेताम्बर-दिगम्बर दोनों परपरा मे संस्कृत की प्रतिष्ठा चदती चली फिर भी दोनो एक अन्तर स्पष्ट देखा जाता है, वद यह कि-दिगम्वर प्रर॑परा संस्कत की ओर सकने के वाद दार्शनिक चेत्र मे अपने माचार्यो को केवल सस्कृत मे टी लिखने को भदत्त छरती है जव कि ताम्बर परपरा पने विद्वान को उसी विषय मे प्राकृत स्वना करने को भी प्रवृत्त करती है यदी कारण है किं ेताम्बरीय सादित मे सिद्धसेन से यमोनि- जयजी तक की दादीनिकं चिन्तनवाडी प्राकृत कृतिरयो भी मिलती है जव कि दिगम्बरीय सादि में मात्र संस्कृतनिवद्र ही वैसी कृतियो मिलती ताम्बर परपरा का सस्छृत- युगमें गरी प्राकृत माषा के साथ जो निकट श्रौर गमीर परिचय रहा है, वह दिगम्बरीय साख में विरल होता गया है क्तमाश्रमण॒ जिनमद्र ने चरन प्रधान कति प्रकत में रची जो तर्वदौली की दोकर्‌ भी गिक ही है मद्भारक श्कठंक ने अपनी विशाल ओर अनुपम कृति राजवरा्तिक संस्कृत मेँ लिखी, जो विशेपावर्यक माप्य की तरह तर्करौली की होकर मी अागमिक हे परन्तु जिनमद्र की छृतियो मे सी कोई खतन्त्र सस्त कृति नहीं है जैसी श्कठ्क की है भकलठक ने ्रागमिक अन्य राजवार्तिक लिखकर दिगम्बर सादिल्य भे एक भकार से व्रिशेषावश्यक के स्थान की पूर्तिं तो की, पर उनका ध्यान शीघ्र ही देसे प्रश्न प्र गया जो जैन-परपरा सामने जोरो से उपस्थित था बौद्ध श्नौर ब्राह्मण प्रमाणशास्रो की कला मे खड़ा रह सके रेस न्याय-पमा की समग्र व्यवखा- बाला कोई जैन भमाण-अन्य आवश्यक था यकठक, जिनमदर की तस्‌ पच ज्ञान, नय श्यादि शभागमिक चस्तुओ की केवल तार्किकं चर्चा करके ही चुप रहे, उरन्ोनि उसी पञ््ञान, सप्तनय श्नादि आगमिके वस्तु का न्याय च्चौर प्रमाण-शाक्रूप से रसा विमाजन किया, दा लच्छण प्रणयन किया, जिससे जैन न्याय श्नोर प्रमाण अन्यो के खतन््र प्रकरणो की मोग पूरी इई उनके सामने वस्तु तो आगमिक थी ही, दृष्टि चीर तक का माग भी सिद्ध-

१० अकलङ्कमन्थत्रय

सेनं तथा समन्तमद्र के द्वारा परिष्कृत हमा हौ था, परर मी प्रवतत ददीनान्तरो के विकसित व्िचायो के साथ प्राचीन चैन निरूपण का तारिक शैली भं भेल विठने का काम सैषा तैप्ठान था जो किं श्चकठंक ने किया | यही सवव है कि कक की मौलिक ईतिर्ो ब्त ही संक्तित है, फिर मी वे शततनीर्थवन तथा घुविचारित है कि श्ागे के जैन न्याय कावेश्राधार बन गहै

यह मी समव है किं भद्रारक कठं प्माश्रमण जिनमदकी महच्वपूरं इतियो से परिचित ोगे प्रत्येक शुदे पर भनेकन्त दृष्टि का उपयोग करने की राजवार्तिंकगत व्यापक शेडी टीक वपी ही जैसी विरोषावश्यकः माप्य ्रत्येक चर्ची मे अनेकान्त दृष्टि लागू करने की शटी व्यापक है

$ 2 अकठैक ओर हरिभद्र आदि-

ताधेमाप्य के इततिकार सिद्धसेन गणि जो गन्धस्तीरूपते निशित द, उनके चौर याकिनीसूयु हरिमद के समकाटीनत के सम्बन्ध मे अपनी समावना तत्ता के दिन्दी विवेचनं के परिचय बतला चुका हँ हरिमद्र की कतियो मे चभी तकं दसा को$ उल्त्ेख नष पाया गया जो निर्रिवादरूपसे हरिम के द्वारा भकख्क की कृतियो के अवगाहन का सूचक हो ! सिद्धसेनगणि की तच््ा्थमागयदरति मे पाया जानेवाला सिद्धि- विनिश्चय का उल्लेख अगर शक्टं के सिद्धिविनिशय का ही वोषक हो तो यहं मानना पगा न्धहस्ती तिद्धसेन कमसे कम अकल्कं के तिरििनिश्वय से तो परिचित थे ही | हरिम ओर गन्धदस्ती थकठंक की विय से परिचित को या नही फिर भी अपिक सभावना इत वातकी है कि कल्क ओर गन्बहस्ती तथा हरिमद ये श्रये दीष जीवन मे थोडे समग्र तक भी समकाटीन रहे होगे | अगर यद समावना ठीक हो तो वर्म की जाटवीं ओर नवी शताब्दी का अमुक समय चकलङ्क का जीवनः तथा कार्यकाल होना चाद्िए्‌

मेती धारणा है कि षियानन्द ओर अनन्तरं जो थकरुद्ध की कृतियो के सर्व थम भ्याल्याकार है मे कलङ्क सा्ठात्‌ वरियािष्य नद तो अनन्तखर्ती अवश्य है; क्योकि इनके परिख भकलङ्क की कृतियो के ऊपर किसी के भ्याल्यान का पता नदी चलता 1 इस धारणा श्रनुसार दोनों न्याल्याकारो का कार्यकाल विक्रम की नवीं शताब्दी का उत्तरार्थं तो अवरस्य होना चाष, जो अमी तक के उनके अन्यो के यान्तरिकि श्वद्कन के साथ मेल खत्ता है |

§ गन्धहस्तिमाष्यं दियम्बर परम्परा मे समन्तमद्र के गन्धहत्ति मह्ामाव्य केने की चर्ची केमी चल पड़ी

आयन १९

थी] वारे मे असंदिग्ध निर्णीय रै फिं-ततवथसू् के उपर या उसकी किसी न्याल्या के ऊपर खामी समन्तमदर ने आघ्तमीमांसा के तिकि ङु भी सिखा टी नहीं है | यह कमी समव नीं किं समन्तमद्र की एेक्ी विशिष्ट कृति का एक भी उल्लेख या अवतरण श्कल्क ओर विचानन्द जसे उनके पदायुवर्ती पनी कर्विर्यो मेँ निना छिएु रह सके वेशक अकृठक का राथवार्तिक युण ओर विस्तार की दृष्टस एसा है जिसे कोई माग्य ही नदीं महामाग्य मी कह सकता है ] श्वेताम्बर परपरा मे गन्धहस्ती की दृति जव गषस्तिमहामाष्य नाम से प्रिद इई तब करीव गन्वहस्ती के टी समानकाटीन अक्क की उसी त्वां पर बनी इई विशिष्ट व्याख्या अगर दिगम्बर परम्परा में गन्धदस्ति- भाष्यं या गन्धहस्ति मषामाप्य रूपते प्रसिद्ध या ग्यबहृत होने कगे तो यह क्रम दोनो फिरको की साहित्यिक परम्परा के अनुकूल ही है

परन्तु हम राजवार्भिक के विषय में गन्धदस्ति-महामाप्य विशेषणा का उष्ेख काही नदी पाति 1 तेरदवीं शताब्दी के वाद दसा विर उष्छेत्र मिलता है जो समन्तभद्र के गन्धदस्तिमाभ्य का सूचन करता हो मेरी दृष्ट मे पठे कै रेमे सव उछेख निराषार ओर विवदन्तीमूलक है तथ्य यह ही हो सकता है कि-अगर तत्वार्थ-महामाप्य या त्तरा्थ-गन्धहस्ति-महामाष्य नाम करा दिगम्बर सादि में मेल वैठाना हो तो शह अकठं- कीय राजवार्तिक के साय दी वैठ सकता है

+ कुः $ ६. पस्तुन संस्करण-

स्तुत पुस्तक में ्कृठ्कीय तीन मलिक कृतिरयो एक साथ सर्वप्रथम सम्पादित इई 1 इन ृतिमो के सवन्य में ताल्िक तया रेतिष्ठासिक दृष्टि से जितना साघन उपलब्ध उसे विद्वान्‌ सम्पादक ने टिणणा तथा भनक उपयोगी परिशिष्टो के द्वारा प्रस्त पुस्तक भे सन्निविष्ट किया है जो जैन, वौद्ध ननोर ब्राह्मण, समी परपरा कै विद्वान के तिर मात्र उपयोगी ही नहीं बल्कि मागीदरशीक भी हे बेशक श्कठक की ्रस्तुत कृतिर्यो भमी तक किसी पव्यक्रम मं नदीं है तथापि उनका महत्व ओर उपयोगि दूसरी दष्ट से शौर मी अधिक्‌ है। अकृटकगरन्यत्रय के सम्पादके पं० महेन्दकुमार जी के साय मेत प्ररिचय हृद साठ का है। इतना ही नदीं बल्कि इतने अ्ररसे दानिक चिन्तन के लाद हम लोग समशील साधक हे इससे पूरा ताटस्थ्य रखकर भी नि संकोच कह सकता कि-पं० महेन्कुमार जी का विदयान्यायाम कम से कम जैन परपरा के लिए तो सत्करारासपद दी नहीं नुकरणीय मी है ! प्रस्तुत ग्रन्थ का बहश्चुत सम्पादन उक्त कथन का साती है मरप्वावना में विदान्‌ सम्पादकः ने श्रककदेव के समय केवारे भे जो विचार भरकर कियाहै,

१२ अकलद्खमन्यत्रय

मेरी समर न्य मर प्राणो के माप वही विचार आन्तरिक यथार्थ द॒लना मूलक होने से सल के विरोष निकट है समयविचार सम्पादक ने जो सूम चौर विवृत तुलना की है वह तत्वज्ञान, तथा इतिहास के रसिको के शिए बडभूल्य भोजन है अन्ध के परिचय मेँ सम्पादकं ने उन समी पदार्थो का हिन्दी मे वर्णन किया है जो श्रकर्कीय भस्त॒त अन्थत्रय मेँ अथित हैँ यह वर्णन सम्पादक के जैन ओर जैनेतर शालो के श्माकंठ पान का उद्वार मात्र है सम्पादकं की दृष्टि यह है कि-जो ्म्थासी नेन मार शङ्ख श्याने बलि पदार्थो को उनके असली सप मे हिन्दी भाषा के द्वारा ही अल्पश्म जानना चाहे उरे वह वणन उपयोगी हो प्र उसे साचन्त सुन छेमे के बाद मेरे ध्यान मतो यष बातत आई रै किं संत के दारा ही जिन्हने रैनन्याय-्रमाण शास्र का परिशीचन किया है वैसे जिङ्ञादु भध्यापकं भी अगर उस वणन को पट ज्येगे तो संत मूलमर््थो के द्वारा भी स्पष्ट एवं वास्तविक रूप मे शङ्ञात, करई प्रमेयो को वे सुक्ञात कर सकेगे ! उदाहरणाय ङ्ध प्रमेयो का निर्देश मी कर देता पभमाएसम्डव, दव्य ओर सन्तानं की तलना श्नादि सर्त भी उनमे से एक है, जिसके बारेमे सम्पादक ने पेसा रेतिदासिक प्रकाश डा है जो समी दारीनिको के लिए ज्ञातव्य दै विशेपो के ध्यान मे यह बात तिना रार्‌ नष रह सकती फिं-कम से कम जेन-न्याय-प्रमाण के विद्याधिरयो के षास्ते तो समी लेन संस्थाओं मेँ यह हिन्दी विभाग वाचनीय रूप से अवश्य सिफारिश कृले योम्य है

प्रस्तुत मन्य उस प्रमाणमीमांसा की एक तरह से पूर्ति टी करता है जे षोड दी दिनो पहले सिधी चैन सिरी मे प्रकाशित इई है प्रमाणभीमासा के हिन्दी टिप्पणो मे तथा प्रस्तावनां नदीं भए पेसे प्रमेयो का मी प्रस्तुत प्रन्थ के हिन्दी वणेन मे समावेश है, ओर उसमे इए नेक पदार्थो का सि दूसरी भाषा तथा शैलौ मे ही नदीं बल्कि दूसरी इष्टि, तथा दूसरी सामग्री साथ समावेश है भत एव कोई मी नेनतत्तन्नान का एव न्याय-प्माणशाज्न का गभीर अम्धासी सधी जेन सिरी के इन दोनो म्रन्यो से बहत कुदं जान सकेगा 1

भ्रसंगवश तर श्पने पूरव लेख की सुधारणा मी कर लेता दू ने ्पने प्ते लेखो थनेकान्त की न्याति वतलाते इए यह माव सूचित किया हे कि-मधानतया भ्नेकान्त ताल्तिक प्रमेयो की ही चर्व करता है अलवत्ता उस समय मेरा भाव तर्क्रधान अन्धो को लेकर दी था। प्र इसके स्थान मे यह कना धिक उपयुक्त है कि-तर्वयुग मे अनेकान्त की विचारणा भले षी मरघानतया ताचिक प्रमेयो को लेकर इई हो फिर भी भनेकान्तद्षि का उपयोग सो श्राचार के प्रदेश मे भागमो में उत्तना ही इभा है जितना कि त्लक्नान के भदेश भे तर्वदयुगीन साल मे भी रते श्ननेक अन्थ बने जिन भँ प्रथानतया आचार के विषयो को ठेर दी अनेकान्तदष्टि का उपयोग इजा है ! अतयव समु्चय रूप से यी कषटना चाहिए कि अनेकान्तदष्टि भावार जौर विचार के प्रदेश मे एकी लामू की गई है

प्राक्षथन १३

धी जैन सिरीच के लिए यह घुयोग दी हे कि जिसमे प्रधिद्ध दिगम्बराचार्यं की कृतियो का एक विशिष्ट दिगम्बर विद्वान्‌ के द्वारा सम्पादन इना है यह मी एक आकसिक सयोग नदीं हे कि दिगम्बराचा्थ की अन्यज अलम्य परन्तु ्ेताम्बरीय भार्डार सदी प्राप देसी विरत कति का प्रकाशन शेताम्बर परंपरा के प्रसिद्ध वाव शी बहादुर- सिट जी सिधी के द्वारा स्थापित्त ओर प्रसिद्ध रेतिषटासिक्र युनि जिनविजय जी द्वारा संचालित सिंघी जैन सिरी में हो रहा है जव सुको विद्धान्‌ मुनि पुणयविजय जी के द्वारा प्रमाासम्रह उपलब्ध इषया तव यह पत्रान था किं वह अपने दूसरे दो सोदरो के साथ इतना अधिक सुक्षभ्जित होकर प्रसिद्ध होगा

दिन्द्र निदवविद्यालय, -सुखलाट संघवी काषी [ जैनदर्लनाघ्यापक हिन्द्र विक्वविद्यालय, कादी, १४-८-१९३९ ई० भूतप्वं जेनवाड भयाभ्यापक गुजरात विद्यापीठ, श्रहमदाबाद ]

येनाशेषङतरफविभ्रमतमो निगूर्न्मीकितम्‌

स्फारागाधक्नीतिसाथैसस्ति निःशेषतः शोषिताः स्याद्ादाग्रतिषग्रभूतकिरणैः व्याप्तं जगत्‌ सर्वैतः श्रीमान्‌ अकलङ्कमालुरसमो जीयाजिनेनद्रः थुः

-अभाचन्द्रः

सम्पादकीय वक्तन्य

$ १. सम्पादन गाधा-

सन्‌ १९३५ के ऋपरैल माह ओने सिद्धिविनिश्वयटीका के पारायण के लिए उसकी एक कापी करना प्रारम्भ किया } उसने कदे जगह श्रमाखसेंमरह म्रन्थ का नाम देखकर अकलङ्ककृत प्रमाणतंमरह के खोज कने की इच्छा इई जुलाई १९३५ मे भान्यवर्‌ पित सुखलालजी जव ग्रीप्मावकाश के वाद काशी आए तो भने प्रमाणसंमरह अन्थक्ी न्वरचा उनसे की एडितजी जहा कीं शाल्ञमण्डार देखने की विधा पति वड़ी सूद्छता से उसका निरीक्षा कर्‌ श्यतिमह् के अन्यो को पनी यादौ शिखवा लेते है उन्दने जवर अपनी नोदकं के पन्ने उलटवाये तो सचमुच पाटन के भडार वे ुने हये प्रन्थो भे प्रमाणसंम्रह ग्रन्थ करा नाम दज था। अमी यह निशितरूप से मालूम नदीं इषमा था कि यह हमारा इष्ट प्रमाणसंग्रह है या धन्य कोई

पंडितजी ने सहज शाल्ञरसिक शी सुनि पुण्यव्रिनयजी को पत्र चिखा उनका यद उत्तर प्राकर किं “उक्त भमाशसम्रह अकल्ककर्ठक है तया उसकी कापी मिजव्द्गेः हम खग ्ानन्दविमोर हो गये, श्रौर मार्च १९३६ मे उनके दवारा मिजवाई गद फएटन्म- नोरथरूम कापी को पाकर तो सचमुच नाच ही उठे } प्डितजी ने इसकी सूचना शौर सचिप्त परिचय उसी समय °वीर, जैनद्ईन तथा जेनसिद्धान्तमास्करः आदिपत्रो मे मिजवा दिया था प्रमाणसंप्रह अन्थ को २-४ बार नाच जाने पर मी सुमे सन्तोष इवा; अत्तः उसके अक्रशः चाचननिभिच ने उसकी एक कापी की 1

समसन द्शनशाख्लो मे भारतीय रूप से मखण्डश्रद्ध पंडितजी ने इत व्रमरण के साथ ही साय थकलद्भ के स्रोपक्िवृतियुक्त लघीयस्य को जो उस समय उपलव्ध था, एकर सग्रह मे प्रकाशित करने की योजना वनाई श्रौर उसे सिधी सीरत के सम्पादकं अपने पञ्तिरूप समशौलसला सुनि जिनविजयजी से करी सुनिजी ने कलाग्रिय वातरू वहादुरसिदजी सिषी के सद्विचारावुसार संचालित श्रौर परिपोषित सिंघी सीरिक में इन्दे , प्रकाशित कएना स्वीकार करके गादूजी के सादित्यिक-असाम्प्रदायिकमाव चो कार्य्य मे परिणत क्या |

पडित घुखलालजी कि योजनां वस्तुतः गहरी श्र्थमरी तथा वेजोड् होती है ! उन्होने जव तकं न्यायककुमुदचन््र का कार्थं चलता रहा ततव वक शुकसे इसकी चर्वा ही नहीं की किसु इनका सम्पादन कटना है 1 नवम्बर १९६३७ मे जव न्यायङ्सुद का कारं किनारे शना्गां तत्र एक दिन टहलते समय उन्न अपनी चिरपोपित योजना बताई कि-श्रमाणसमद ओर लघीयस्य के साय ही साय न्यायविनिश्वयमू को मी मिलाकर

अकलङ्कमन्थत्रय

°अकालङ्क प्रन्धत्रय , को एक साथ प्रकाशित किया जाय श्नीर इनका सम्पादन नै करै |? भेरा अभी तक यही ख्याल था कि जिस प्रकार जैनतर्कमाषा प्रमाणमीमांसा मादि का कर्थ हम पंडितजी के सम्पाद्कत्य भँ आंशिक भार को उठा कर करते धार है उसी तरह प्माणसंप्रहादि का कार्थं मी इसी संभूयकारिता मेँ दी निष्पन्न ष्टोगा पंडितजी का ्षीणशरीर पर अद्भूत युषटमनोगति एवं समुचित ग्यवस्थाप्रणाली का ध्यान कके तो सु रसा लगा किं-पंडित जी कर्यो मेरे ही ऊपर यह मार डाल रहे है ? क्या पंडित्तजी स्च सन्मतितकं की कार्थसमातिकाल की भाति फिर लम्बा विश्राम करना चाहते है £ पर री ये आकार ्रमाणमीमासा के अवरिष्ट कार्यं के भार का विन्वार याते ही विल्लीन ह्ये गई वस्तुतः उस्र समय भीमासा का कार्यं इतना बाकी पडा था कि उसके निवटते नियते ही करीव १॥ साल का समय लग गया पडितजी के शस स्नेह श्याश्वासन के वीच कि-*भाई, जिम्मेवारी तुम्हारी रै कार्य तो हम खोगो का एक दूसरे की पूर्ण मदद से चलेगा ही ' भने इसका सम्पादन मार बडे उत्साह से ते च्या; क्योकि उनके साथ ३- वर्षो के प्रदयक्षकायालुमब से भै यह समता ही था कि-पंडितजी के इतने का कहने अर्थ है-सेपादन की रूपरेखा, योजना एवं व्यवस्या के निदर्यन का वौद्धिक भार लेना इस तरह पूण साधनां तथा आश्स्त- वातावरण के वीच सकः सम्पादन चालू किया गया उसका फलदूप यह संस्करण है इस संस्करण मेँ मुद्रित स्वोपक्नविदृ्तिसषित लघीयस्य, न्यायतिनिश्चय तया प्रमाण- सम्रह ये तीनो प्रन्थ सर्वप्रथम ही प्रकाशित हो रहे सिर्फ इतः पूवं लधीयन्ञय की मूलकारिका मभयनन्दि की वृत्ति के साथ माणिकचन्दर अरन्यमाला भे प्रकारित इद है § २. संस्करण परिचय- भ्रसतुत संस्करण भें प्रसाबना के अतिरिक्त तीन स्थूल विमाग ै-१ मूलगन्थ, प्प, परिदिष्ट इनका सिप परिचय इस प्रकार हे- मूलग्रन्थ-मूलप्रनथो भं सवप्रयम रुधीयल्ञय ततः न्यायविनिश्चय पि प्रमाणसंरह का मुद्रण इश्चा है | क्रम में मन्थो की रचनाकार के इतिहास का धार्‌ लिया है रचनाहौली तथा विचारो की प्रौढता का व्यान से निरीक्षण करने पर मालूम होता षि ्रस्तुतमन्यत्रय मँ रुषीयस्रय दही ्कठंकदेव की व्ा्कृति है तथा अमाणसंग्रह अन्तिम लघीयज्ञय खोपन्नविदृति सदित् सुद्धित कराया है। प्रभाचन्दाचार्य ने इसके उपर १८ हजार श्ोक प्रमाण नन्यायुसुद चन्र नाम की ्त्काय टीका लिखी वह इतनी विस्तृते एवं शान्नाथैवहल है कि उसमे से मूल कारिकाथो एव विवृति को दद निकालना श्रयन्त कठिन है फिर श्ममी तो उसके मात्र दो परिच्छेद ही मुद्रित इए है, जिनमें ति कारिका की ही बिद्रति ्राती हे। अतः कलंक के हदं को जानने के लिए यह भाव- सयक इणा कि इसका अखण्ड रूप से पृथक्‌ सुदरण हो इन्दी भर्त्या के शाब्दिक एवं

सम्पादकीय

आर्थिक शिलखरधार पर ही उचरकाटीन आचाये ने जैनन्याय का मदाप्रासाद्‌ खड़ा किया ह! अकठकदेव का वाक्यविन्यास एव प्रतिपादनीटी इतनी दखगाह दै कि उमे न्यायशाज्ञ की योम्यभूमिका रनेवाले रोगो को भी विना श्लम्बन के सीवे ही प्रवेश कना वस्तुतः कठ्नि हे ¡ इतीटिष्‌ प्भाचन्दं के न्पापञुसुदननदर से कारि काथो के श्रनेक उत्थानवाक्यो से उन कः वे उत्थानं वाक्य दिषु दै, जिनसे कारिका क्रा सामान्यतः प्रतिपा थै भी मासितहो जाय ओर प्रतिपाय वरिषरयो का स्थुल वर्ग वीरण मी ष्टे जाय

इसी तदह म्यायविनिश्रय कै उपर बादिराजरूिबिरबिव २० हजार शोकं प्रमाण *न्यायविनिश्वयविबरण नाम की टीका उपड है, जो भाजतक् अमुद्रित दै } उम न्यायविनिश्चय की कारिकाञो के शाब्दिक तथा श्रा्थिकं टि से द॒ दस थ्ै तक किए भए है साधारणतः २।३ अथे तो चलते ही है ! उस लिङ्ितविविरण से ब्रिधय- वर्गीकरण को ध्यान भे रखकर कारिकावैस्पदीं उत्यानवाक्य न्यायविनिश्वय मे टकर दे दिर है ¡ उत्थानवाक्यो के दवारा विषयावगाहन को घुशम वनने के लिए कंदी कंदी एक कारिका के पू्वप् श्रौर उत्तरपक्षो के अंशो को पृथक्‌ उत्थान देकर छुपाना पड़ा श्न उत्यानबाक्यो के विष्वृत भथ को इटि सदिप किया है कि-जिसमे व्यर्का सेमर भी वे भोर आवर्यक भाग मी टे

अ्रमाणसरह की एक मात्र प्रति पाटन के भंडार मे बिली यह नितान्त अश है। श्म जो कारिकांर गधमाग मे प्रतीक स्प से शामिल थे, उने पथक्‌ कके कारिकाकेङ्यमे[ 1 इसत्रक्रिटमे पाया है| प्रमाणसुप्््‌ पन्य पर सिद्धिषि- निश्वयरीका के उकतेखावुसार एक "प्रमाणसम्रहाठ्कार या प्रमाणसमहमाम्य नामं छी ठीकाकापतातो चक्तादहैः पर्‌ वष्टन जाने कित भंडार भँ कीटको का भोजन वन- कर शत्तभ्तो की हासयास्पद शाङमक्ति का उदाहरणा वन श्चपना जीवन निःशेष कर री होगी यदपि दसवे विष्यो का सामान्य विमाजनः कर्‌ शरपनी ओर्‌ से उत्यानबाक्य देने का पिले विचार करिया था; परर यह सोचकर कि-“जव लघीयक्षय नौर न्याय- विनिश्वयमे प्राचीन टीक्राकरिफे दी उत्थानबाक्य दिए है वथ इसमे अपनी ओर्‌ से शमी कड शिक जेता का तैखा भूलप्रन्य ही प्रकाशित करना समुचित होगा, पनी ओर से उत्यानवाक्य देने की इच्छा को विपयसूतर मे ही सीमित कः दिया शरीर प्रमाण- संम को विना किसी उत्यानवाक्य के मूलमाश्र हो चपाया

सषीयकञय मे शराए हए अवतरणबाकयो को इटातिकर टाप भै ”, उवल इनषटड कामा भे तथा प्रमाणसंग्रह के भवतरणवाकयो को चासूटादप मे ठी उवच इनवटेड कामा मे छपाया